Tuesday, February 28, 2017

कर्ण

Preface

Karna, from the mahabharata era was the first son of Kunti, the mother of 5 pandavs. No one knew about this truth except karna and kunti till karna died and sacrified his life for his brothers and mother. Karna was made a king by his friend Duryodhana, with whom he has maintained his loyalty and friendship untill his death. Had it known to everyone that Karna is the first child of KUNTI and eldest of pandav borthers, there would have been no Mahabharata, where Duryodhana had also accepted him as the king. 

Times have changed but still we have KARNA's in our society, protecting us on borders and from the devilish desires of enemies across the nation. Many have been the sole support of their parents and a caretakers of them in their old age. Still they took the nation as their first priorty and have sacrified their life protecting us and giving us a safety blanket to breathe and live in peace. 

This poem is a salute to all such brave defence personal and to their parents and families who bear such a loss, with tears in their eyes, and have held their head high with dignity and pride.
कर्ण
था महावीर राजा कर्ण वह 
दान का जिसके न कोई अपार 
माँगा कुंती ने जिससे बदले में 
कर्त्तव्य दान ...
सोचा ना एक पल भी उसने 
दानी था वोह राजा महान 
दे अपनी जान वोह ...
बचा गया कुंती की आन
महा भारत का पुत्र वोह 
दीखता नहीं उसका त्याग 
जीवंत पूरी प्रजा कर 
ओढ़ लिया उसने वस्त्र श्वेत 
..कथा पुरानी बहुत है अब 
पर रहे कर्ण अभी भी रहते 
दे कर सुरक्षा मानव को 
आप अपने जीवन है देते 
कहती माँ भर आंसू आँख में 
गर्व है जीवन तुझ को दिया 
बाप पोछते आंसू आँख के 
सीना गर्व से चौड़ा मेरा किया 
कहती बहन आओगे कब 
भैया मेरे नयन मेरे तकते 
लेकर राखी हाथों में ..
तुम्हारा रास्ता हम सब देखते .
-नीतू (१/३/२०१६)

Wednesday, October 19, 2016

nirvaan

na khwarishen hain..na ummede hai
naa hi chah kal kuch paane ki.,
phir bhi ek khumari hai.,
zindagi jee jaane ki.

saath nahi toh bina tere hi,
khwabon mein tujhe paane ki
kuch par phir parindo ke,
chalte pao se ud jaane ki.

kya de gi zindagi jo paas uske,
bas mann ki udano ki.,
paa liye jo dil mein bas.,
na chah ab kuch paane ki.

-neetu (19/10/2016: 21:23pm)

Saturday, May 07, 2016

Khwarishen

Kuch khwarishen rakhta Hun dil mein,
Kal ke khushwaar subah ki..
Kuch naye din ki shuruat ki..
Kuch nahi sansoon ke aagaaz ki.
Rehte saawaal dher saare Mann mein,
Jawab kiska dhondta hoon,
Kuch hisaab karta hoon..
Kuch sila deta hoon,
Poochna na mujhse koi
Sawaal aisa Jo ho be-jawaab,
Takhaton par bithaya tujhe,
Na ho jaaye dil be-zaar,
Khuli kitab hai zindagi meri,
Na kabhi kuch chupaya hai..,
Intezaar karo kuch samay..,
Bharosa abhi paya hai.



Monday, February 29, 2016

महावीर कर्ण

Preface
This poem is a tribute to a brave young soldier of Indian Air Force., who left this world while saving a thousands of people. He had a choice to saving his life, and to come back home to his loving father and mother, his newly wed wife and his ever so loving sisters. His duty came first and he choose the first. Brave he was..truly a KING. He could not be compared to anyone else than Karn, who inspite of being the most deserved, gave his life for his brothers and his friend.

था महावीर राजा कर्ण वह
दान का जिसके न कोई अपार
माँगा कुंती ने जिससे बदले में
कर्त्तव्य दान ...
सोचा ना एक पल भी उसने
दानी था वोह राजा महान
दे अपनी जान वोह ...
बचा गया कुंती की आन
महा भारत का पुत्र वोह
दीखता नहीं उसका त्याग
जीवंत पूरी प्रजा कर
ओढ़ लिया उसने वस्त्र श्वेत
..कथा पुरानी बहुत है अब
पर रहे कर्ण अभी भी रहते
दे कर सुरक्षा मानव को
आप अपने जीवन है देते
कहती माँ भर आंसू आँख में
गर्व है जीवन तुझ को दिया
बाप पोछते आंसू आँख के
सीना गर्व से चौड़ा मेरा किया
कहती बहन आओगे कब
भैया मेरे नयन मेरे तकते
लेकर राखी हाथों में ..
तुम्हारा रास्ता हम सब देखते .
 -नीतू (१/३/२०१६)

Thursday, January 14, 2016

बिनती

हे ईश्वर येह बिनती मेरी,
अगले जनम की सुन लीजो,
कुछ ना दे, दे ठीक लगे जो
पर बिटिया न मोहे कीजो
जो हो बिटिया जन्म मोहो
तो दूजे को ना दीजो

गयी दूजे के घर तो छुटा
घर बार का सहारा
एक छत दे ले लिया
जो था पास सहारा
सपने गए .. नींद गयी
बिना लौ के जींद भई
बहते अश्रु दे कर भी
रोटी दो को मोहताज भई
थामे हाथ तेरा ही साई
मीलो दूर में चलती गयी
फिर बसा के अपने में खुद को
कुछ सपने बुनती गयी
गीली माटी से सपनो का
टूटा अंश लगा सीने से
कुछ सवाल पूछती रही
कुछ जवाब ढूंढती रही
ढूंडा ढांडी के खेल में
नज़रे पुराने निशान कई
मिलती जिससे और कुछ
आदते नई...
बिखरा सा झूठा सा
मंदिर वो भगवान वही
नहीं रकीब मेरा वोह तो
सौदागर कोई...



Wednesday, August 12, 2015

मुस्कान


क्या कहूँ तेरी खूबसूरती को.. अलफ़ाज़ नहीं पास मेरे ..
देखा तुझे जो आज .. मेरी सुबह हो गयी .. 
शायर तोह नहीं मैं.. पर कुछ अंदाज़ तेरा ..
जुबां पर जो आया तोह .. ग़ज़ल हो गयी ..
-नीतू (12/8/2015)

आइना

कुछ देखती हूँ तुझे तोह लगता है आइना है ..
लगता है अक्स यह कुछ जाना पहचाना है,
कुछ दर्द.. कुछ मस्ती .. कुछ शब्द अनकहे से..
क्या कहु.. क्या पूछू .. नहीं पता जो कहु
हो मेरे जैसी पर फिर भी दूर हो ..
जीती हो मज़बूती से फिर भी क्यों मजबूर हो ..
खुशियाँ है बिखेरी .., बना मोती आंसुओं के,
है जहान रोशन सा.. कुछ तेरे कुछ मेरे..

दिवाली आई है

बहुत हुए रंजो गम, थाम लो खुशियों का दमन
साथ छोड़ उन गमो का ..बढ़ चलो खुशियों की डगर,
घबरा रहा हो मन अगर ..थाम लेना हाथ मेरा,
दौलत नहीं दुनिया की , पर रखेंगे पलकों पर हम,
ना रहो उदास तुम, देखो उजाला लायी है ..
अब अमावस के दिनों बाद, रौशनी की दिवाली आई है
- neetu (12/08/2015 21:57)

Wednesday, July 29, 2015

सावन

बटोरी है खुशियाँ मैंने ..
चुन के अपने हाथों से ..
अच्छा लगे तोह फूल है..
नहीं माटी की धूल है ..
कुछ रंग मौसम के ..
कुछ आप जो दिल में बस गए ..
वह रंगीन सावन का रंग..
और रंगो में लहराता आँचल
मिले फुर्सत तोह मिला लेना
अपने रंग साथ मेरे भी बाँट लेना